rose serbet

मेरा… गुलाब शरबत… और..नूरजहां…

एक समय की बात है… दिल्ली की एक…सिंदूरी… सांझ थी.. बादशाह जहांगीर सम्राज्ञी .. नूरजहां के साथ अपने गुलाबों के बाग में टहल रहे थे… गुलाबी और नारंगी …आसमान की रंगत धीमे-धीमे फीकी पड़ती जा रही थी….किले की.. प्राचीर सेअरूण भी थकान से चूर हो कर मंद गति से भगवान भास्कर के रथ को ..अस्ताचल की ओर निर्देशित कर रहे थे…. गुलाबों की खुशबू फिजाओं मे तैर रही थी. इस माहौल ने सम्राज्ञी नूरजहां को फारस मे बने खुशबू दार शरबत की याद दिला दी, जिसे उन्हें हर रोज फालुदा मे मिलाकर दिया जाता था…सुगंध बिखेरते गुलाबों को देखकर मल्का-ए-हिन्द को ख्याल आया कि क्यों न इससे शरबत तैयार किया जाए।

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बस…. फिर क्या था…बडी-बडी भट्टियां तैयार की गई …बडे-कडा़ह चढे… गुलाब की ताजी….. पंखुड़ियाँ एकत्र की गई… उनको साफ पानी से धोकर.. सूती कपडों पर फैलाया गया …और तब उनको कडाहों मे डालकर उबाला गया…., फिर.. गुलाब की पंखुड़ियों को बाहर निकाल कर कुटनियों द्वारा पीसा गया… उसमें…चीनी इलाईची डालकर फिर से उबाला गया.. और इस प्रकार शरबत बनाने की कला मुगल काल में अपने चरम पर पहुंची। शरबत बनाने के भिन्न-तरीक़े ईजाद किए गए और बादशाह और मल्का-ए-हिन्द के लिए शाही हाकिमों ने खूशबूदार और जायकेदार शरबत तैयार किए। कहते हैं उस दौरान शाही हाकिमों की दरबार में अहम भूमिका होती थी… और वे बडे शानौ-शौकत से शाही दरबार में जलवा फरोज होते थे…. जाहिर है… बादशाह की सेहत का ख्याल जो रखते थे…!.
प्राचीन समय में शरबत को पनाका कहा जाता था…’पनाका’को फलों के रसों से तैयार किया जाता था… इनका जिक्र शास्त्रों, पुराणों और अन्य ग्रन्थों मे भी किया गया है।अर्थशास्त्र में शरबत का जिक्र’मधुपराका”के रूप में किया गया है… कहा गया है कि… घर आये पाहुन का स्वागत शहद मिले दही और घी से किया जाता था और ये पेय पदार्थ-पाँच महीने की गर्भवती महिला को भी दिया जाता था…यहां तक की आजीविका की तलाश में घर से निकलने वाले युवाओं… ,देशाटन पर जाने वाले…ग्रामजनों को, विद्या-अर्जन के लिए वन-गमन करते विद्यार्थियों को, तीर्थाटन के लिए गृहत्याग करते…. सद-गृहस्थ ग्रामवासियों को यह”मधुपराक”दिया जाता था। यही नहीं… विवाह के लिए जब दुल्हा…. दुल्हन को विदा कराने जाता था तो…उसका स्वागत’मधुपराक’से ही किया जाता था.. और जब दुल्हन विदा हो कर ससुराल पहूँचती थी तो इसी”मधुपराक”को दुल्हिन की खातिर तब्जो के लिए पेश किया जाता था।

“मुझे एक सुरज दे दो,मुझे परवाह नहीं कि ये कितना गर्म है और शरबत,मुझे परवाह नहीं कि ये कितना ठंडा है, मेरी जन्नत उतनी आसानी से तैयार हो जाती है जितनी आपकी फारसी”
लार्ड बायरन ने अपनी इस्तांबुल यात्रा के दौरान ये कहा था।
प्रिय पाठक!
शरबत एक फारसी शब्द है… जो अरबी भाषा के शब्द’शरीबा”से आता है जिसका अर्थ है”पीना” अरबी भाषा में किसी भी पेय को” …शरबा” कहते हैं। तुर्की तथा फारसी में इसे”शेर्बत”कहते हैं। भारत हो…. इरान हो… अफगानिस्तान हो.. मिस्र हो… याने कि दुनिया के जिस भी हिस्से में गर्मी जीवन का हिस्सा है… वहाँ शरबत की मौजूदगी लाजमी है… हमारे देश में.. पाहुन का स्वागत ठंडे शरबत के गिलास से अब भी किया जाता है…. पूर्वी बिहार और उत्तरप्रदेश के ग्रामीण अंचल में अब भी आगुन्तकों का स्वागत सत्तू और गुड़ के शरबत से किया जाता है.. और…हाँ… यदि घर में कुछ भी उपलब्ध नहीं है तो मीठे बताशे और एक गिलास ठंडा शीतल जल पाहुन के सम्मान में घर के आंगन में सूत से बुनी हुई खप्पर छट पर बिराजे पाहुन की खिदमत मे पेश किया जाता है। हालांकि अब शरबत की जगह …कोकाकोला और स्लाइस जैसे पेय पदार्थों ने ले ली है…. जैसे-गर्मी ..बढती है… और पारा४४डिग्री को छूने लगता है, बाजार में कई रसीले फल दिखाई देने लगते हैं.. इन मौसमी फलों को ठंडे पानी को दूध या पानी में मिला कर ठंडा पेय तैयार किया जाता है। ये शरबत औषधीय महत्व के भी होते हैं… ये एंजाइमों, खनिजों, और विटामिनों के साथ हमारा खून भी बढाते हैं। “शारिबा”को कहते हैं मुगल बादशाह १६वीं शताब्दी में भारत लाये थे।इसकासबसे प्राचीन उल्लेख12वीं शताब्दी की एक फारसी पुस्तक,”जखीरियेख्वारजम शाही”मे मिलता है।लेखक इस्माइल गोरगानी ने अपनी पुस्तक में ईरान में उपयोग की जाने वाली शरबत की क्ई किस्मों का वर्णन किया है।”बाबरनामा”के अनुसार शरबत बाबर का पसंदीदा पेय था।कहते हैं कि इस पेय को बनाने के लिए वह लोगों को हिमालय पर्वत पर भेजता था ताकि वे वहाँ से ठंडी बर्फ लेकर आएं।
प्रिय पाठक…. यदी आप मिस्र जाइयेगा तो… आपको सडकों के किनारे सास-सास की आवाजें सुनाई देंगी, गधा और घोडा़ मैं गाना गाते हुए कुछ लोआयेन्-आयेन् गाते हुए सुनाई देंगे… ये शहतूत, दही, इमली
नीबूं और गुलाब जल से तैयार रंगीन पेय बेचते हैं। कुप्पी लगे बडे गिलास को कांधे पर डालकर शहरों की गलियों में इस रंगीन पेय की रंगीनियत को बिखेरते हैं।तुर्की… लेबनान ..सिरिया और जार्डन मे…गर्मियों के लिए पेय पदार्थ तैयार करने के लिए मुख्य रूप से दही का प्रयोग किया जाता था… और इस पेय को उन लोगों ने नाम दिया था.. टेन, आयेन्, या “डो”… !!
प्रिय….. पाठक…. क्या… जानियेगा की…. मिस्र में शरबत की विभिन्न किस्में हैं… और इनमें सबसे अहम… मेरा.. प्यारा… गुलाब शरबत….!
एक कहानी.. का जिक्र यहाँ पर करना चाहूंगी…. कि एक मुस्लिम अल-हज्जाज ने सीधे नदी का पानी लिया और गुलाब के फूल और कपूर की अतर से स्वादिष्ट पेय तैयार किया.. और इसका जायका बेहतर करने के लिए उन्होंने एक घडा़ लिया इसमें मोटी दाने दार चीनी घोली, गुलाब जल मिलाया और फिर इसका गाढा पेस्ट बना ने के लिए आग पर रख दिया…।
इसके बाद उन्होंने पेस्ट को समान रूप से नए घडे मे अंदर की तरफ से चिपका दिया…घड़े ने इस पेस्ट को सोख लिया और कोटिंग का रूप धारण कर लिया…।उन्होंने इस घड़े को अपने पास रखकर लिया… अब.. जब भी कोई उनके पास आता… उनसे पानी माँगता वो पेस्ट का कुछ देर पानी में घूलने का इंतजार करते.. और फिर.. उस व्यक्ति को पानी पीने को देते… जो इसे …पिता वो इसे चमत्कार समझता… और… उस गुलाब शरबत का गुणगान करता..।
और…. हाँ….अब ..कहानी मेरे… गुलाब शरबत की…
पहले मैने गुलाब की पंखुड़ियों को धोकर पीसा… फिर उसमें चुकन्दर मिलाया… पानी को उबाला.. फिर…. गुलाब का पेस्ट डाला…तुलसी डाली…. धनिया और चुकंदर का पेस्ट डाला… चीनी की चाशनी बनाई… इलाईची डाली.. फिर गुलाब के मिस्रण को चाशनी में डाला… फिर शरबत को…प्याली मे छान लिया…बर्फ.. कूट के डाली…. नींबू से… सजाया…जी….!!!!!!!!
लिजिये… हाजिर है.. मेरा…. गुलाब शरबत….!!!!!!

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मँजू दिल से

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