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ढोला-मारू : पधारो म्हारे देश

ढोला-मारू
पधारो म्हारे देश.
सुनते ही आँखों के आगे घूम जाता है.. रंगीला राजस्थान… कीकर बबूल के वृक्षों से मुस्कराकर झाँकता चाँद, दूर -दूर तक फैली स्वर्ण कणिका सी चमकती रूपहली रेत…अरावली की खूबसूरत पहाड़ियों से उड़ान भरते पाखी…..छोटी-छोटी ढाणियों से निकलता धूआँ …..सांगरै का साग और बाजरे की रोटी की सोंधी महक के साथ …दूर.. टेकड़ी से आती सारंगी की धुन, धुन के साथ आती स्वर लहरियां—
“आररह… आररह.. रह… आयो रे मोरा ढोलना”
एक प्रसिद्व लोकगीत।मरू प्रदेश …यूँ तो वैभव, वीरता, शूरताऔर अदम्य साहस का प्रतीक रहा है. ऊँटों का कारवां, तलाबों की भूमि, ऊबड़ -खाबड़..जमीन और कठिन जलवायु ने राजस्थान के लोगों को साहसी और मजबूत बना दिया है,और उनके अदम्य साहस, वीरता औऱ कठोरता से निकली हैं-,राजस्थान की रँगीन और अद्वितीय लोककथायें.,…औऱ ज़िंदगी के लिये रुमानियत और प्रेम!
इसी रंगीले राजस्थान के मालवा प्रदेश मे जन्म लिया एक प्यारी सी प्रेमकथा -,ढोला-मारू, ने।
यूँ तो..तो राजस्थान की लोककथाओं मैं बहुत सी प्रेमकथाएँ प्रचलित हैं पर इन सब मैं’ढोला-मारू’की गाथा विशेष लोकप्रिय रही है।इस गाथा की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाए जा सकता है कि आठवीं सदी की इस घटना का नायक”ढोला”राजस्थान मैं एक प्रेमी नायक के रूप मे स्मरण किया जाता है। औऱ प्रत्येक पति-पत्नी की सुंदर जोड़ी को”ढोला-मारू”की उपमा दी जाती है।यही नहीं आज भी लोकगीतों मैं रमणियाँ अपने प्रिय को “ढोला”नाम से ही संबोधित करती हैं, ढोला”शब्द पति का ही “पर्याय”,,,बन गया है। राजस्थान की ग्राम-,बानितायें आज भी विभिन्न अवसरों पर,”ढोला-मारू”,,के गीत बड़े चाव से ढोलक पर गाती हैं।
कहते हैं.. पूंगल का राजा अपने देश मे अकाल पड़ने के कारण मालवा प्रान्त मे प्रवास के लिये अपने परिवार सहित जाता है।पूंगल के राजा की”मारवणी”नाम की शिशु वय की एक कन्या थी।उसी शिशु कुंवरानी “मरवाणी-मरु का बाल विवाह मालवा के राजकुँवर” साल्ह कुमार-ढोला”से कर दिया जाता है। उस समय ढोला की उम्र 3 वर्ष की थी औऱ मरवाणी(मरु)डेढ़ साल की थी इसी कारण मरु को ढोला के साथ मालवा विदा नही किया गया। तय हुआ की व्यस्क होने पर ढोला मरु का गौना कराकर विदा करा के मालवा ले आयेगा।
समय काल अपने पैरों के निशान छोड़ता हुआ अपने गंतव्य की ओर बढ़ा जा रहा था….और इसी दौरान”ढोला”,का एक और विवाह”मालवानी”के साथ हो गया जो सुंदर और पति अनुरक्ता थी।ढोला अपनी अबोध पत्नी”मारवणी-मारू”को भूलता चला गया…. इधर मरवाणी एक सुँदर षोडषी के रूप मे परिवर्तित हो चुकी थी।पूंगल का राजा मारवणी का पिता पहले तो ढोला का इंतजार करते रहे की ढोला अपनी पत्नी और…उनकी पुत्री”मरु”को विदा कराने आएगा, लेकिन जब मालवा से कोई सन्देश नहीं आया तो उन्होनें संदेश वाहक मालवा भेजे, इधर ढोला की पत्नी”मालवणी”को ढोला के प्रथम विवाह का भान हो गया था.. उसको यह भी पता चल गया था की”मारवणी”बेहद खूबसूरत औऱ कोमलाङ्गी है, इसी कारण उसमें सोतिया-डाह ने जन्म ले लिया। मालवणी किसी भी सन्देश वाहक को ढोला तक नहीं पहुंचने देती थी… उनको राह में ही मरवा डालती थी.. औऱ ढोला इन सब बातों से अनजान था और मरु को उसने बिसार दिया था…. औऱ “कमलनयनी मारू”अपने पितृग्रह के छज्जे पर खड़े होकर ढोला को याद करते हुए अश्रू गँगा बहा कर अपने पिता को विचलित कर देती।


एक दिन मालवा से एक सौदागर पूंगल आता है औऱ ढोला के दूसरे विवाह के बाबत पूंगल के राजा-मारू के पिता को बताता है…, मारू उन दोनो का वर्तालाप सुन लेती है व उद्यान में जाकर मोर,पपीहा, सारस.. कोयल से जाकर ढोला की शिकायत करती हुई जार-जार रोती है।उसकी यह हालत देखकर पूंगल नरेश बहूत व्यथित हो जाते हैं व अपनी कार्यकारिणी की बैठक बुलवाते हैं।बैठक मैं तय होता है की मालवा से “ढोला’को बुलाने हेतु चतुर”ढोली”,(दाढ़ियों)को मालवा भेजा जाए…औऱ गाने के माध्यम से ढोला को मारू की याद दिलाई जाये।मारू ने चतुर ढोली को मारू राग मे दोहे बनाकर दिए औऱ उन दोहों को ढोला को सुनाने के लिए कहा।सावन मास मे ढोली मालवा पहुंचता है।
सावन का महिना था। ………ऐसे मैं चतुर ढोली नरवर के महल मे पहुँचा…. रात मैं रिमझिम बरसती घटाओं के साथ उसने ऊँचे स्वर मै राग”मल्हार छेड़ दिया…. मल्हार राग के सूरों ने ढोला को झूमने पर मजबूर कर दिया…, ढोला फन उठाये विषधर के समान झूमने लगा…, तभी चतुर ढोली ने राजकुँवरी”मारु”के दोहों के रूप मैं दिए गए संदेश को गा के सुना दिया, गीत मैं जैसे ही ढोला ने राजकुँवरी का नाम सुना, उसे अपने पहले विवाह की याद आ गई …औऱ उसकी आँखो से आँसू टपकने लग जाते हैं।”ढोली”अपने गायन के माध्यम से”ढोला को बताता है की”मारू”कितनी सुन्दर है… वह कहता है की-“राजकुँवरी के चेहरे की चमक सूर्य के समान है झीणी कपड़ों में उसका शरीर ऐसे चमकता है मानो स्वर्ण झाँक रहा हो।मोरनी
मोरनी जैसी चाल, हीरों जेसै दाँत, बहुत से गुणों वाली नम्र व कोमल है”ढोली गाता है”।

सुबह राजकुमार ने उसे बुलाकर पूछा तो उसने राजकुमारी का पूरा संदेश सुनाया।आखिर ढोला ने अपनी पहली पत्नी को लाने का निशचय किया पर उसकी दूसरी पत्नी”मालवणी”ने उसे रोक दिया।ढोला ने कई बहाने बनाए पूंगल जाने के पर”मालवानी”हर बार उसे रोक देती।
आखिर एक दिन ढोल बहुत तेज चलने वाले ऊँट पर सवार होकर'”मारु”को लेने पूंगल पहुँच जाता है।मारू ढोल से मिलकर खुशी से झूम उठती है।दोनों पूंगल मे कई दिन बिताते हैं।एक दिन जब दोनों मालवा जाने के लिए राजा पिंगल से विदा लेते हैं तब जाते समय रास्ते के रेगिस्तान में राजकुमारी को सर्प दंश मार देता है पर कहते हैं तब शिव पार्वती प्रकट होकर मारू को जीवन दान देते है।लेकिन इसके बाद उनका सामना उमरा-सुमरा से होता है जो राजकुमार को मारकर मारू को हासिल करना चाहता है।वह रास्ते में जाजम बिछाकर महफिल सजाकर बैठ जाता है।उधर ढोला अपनी खूबसूरत पत्नी को लेकर जब उधर से गुजरता है तो उमर उससे मनुहार करता है औऱ उसे रोक लेता है।ढोला ने मारू को ऊंट पर बैठे रहने दिया औऱ खुद उमर के साथ अमल की मनुहार लेने बैठ गया।इधऱ “ढोली”गा रहा था औऱ राजकुमार व उमर अफीम की मनुहार ले रहे थे।मारू के देश से आया “ढोली”बहुत चतुर था, उसे उमर सुमरा के षड्यंत्र का भान हो जाता है।ढोली चुपके से इस षड्यंत्र के बारे में राजकुँवरी को बता देता है।
राजकुमारी भी रेगिस्तान की बेटी थी, उसने ऊँट को ऐड़ मारी जिससे ऊँट भागने लगा।ऊँट को रोकने के लिए ढोला भागने लगा, जेसै ही ढोला पास आया, मारू ने कहा-,धोखा है जल्दी ऊँट पर चढ़ो, ये तुम्है मारना चाहता है।इसके बाद दोनों मालवा पहुंचते हैं वहाँ राजकुमारी का स्वागत किया जाता है औऱ मारू-,वहाँ की रानी बनकर राज करने लगी।
कहते हैं ढोल मारू का विवाह अजमेर जिले के”बढ़ेगा”ग्राम में हुआ था।जहाँ आज भी पाषाण का एक तोरण द्वार उनके प्रेम का मूक साक्षी है।करीब ८००साल पुराने इस तोरणा द्वार पर अजंता औऱ एलोरा की तरह मूर्तियां उकेरी गई हैं।बताते हैं की तोरण मारने की रस्म व विवाह के पश्चात हुए भोज में ७२ मन लाल मिर्च का प्रयोग किया गया था, इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितने लोगों ने इस विवाह में जीमण किया होगा।
“ढोला मारुरा” कवि कलोल द्वारा 11वीं शताब्दी में रचित एक”लोकभाष्य-काव्य”कितना सुँदर.. कितना.. अनोखा!!

– मंजू दिल से

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