Chitrakote-Chattisgarh

छत्तीसगढ़- एक कौशल प्रदेश

“चलो मन बजावे जिहाँ मोहना रे
राधा रानी नाचे ठुमा-ठु-म
रास रचाये जिहाँ गोकुल गुवाला रे
मिरदंग बाजे धुमा धुम
मोर सुवा ना मिरदंग बाजे धुमा धु-म
तरी हरी नहा ना रे, नाना मोर सुवा न
तरी हरी नाना रे नाना….(छत्तीसगढ़ का सुवा गीत)

छत्तीसगढ़… याने के पौराणिक काल का”कौशल प्रदेश”…उँची-नीची पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा हुआ…. घने जंगलों वाला… राज्य…,धान की भरपूर पैदावार होने के कारण… इस रंग बिरंगे…”कौशल्या”के पीहर को “धान का कटोरा भी कहा जाता है।उत्तर में…सतपुड़ा… मध्य में महानदी.. बस्तर का पठार.., औऱ साल ..सागौन.. साजा..बीजा… औऱ बाँस के वृक्षों की खुशबू से सुरभित इसका अरण प्रदेश…. ,औऱ हाँ.! इसके हृदय स्थल पर …चंचला…”बैगा”बनिता सी अठखेलियाँ करती…अरपा, पेरी, इँद्रावती..और महानदी नामक जलधाराएं..
आना चाहूंगी अब इस छोटे से… लेकिन ,खनिज संपदा… से…भर पूर छत्तीसगढ़ की सँस्कृति पर। जैसा कि हम जानते हैं..सँस्कृति का सतत विकास मान मानवीय चेतना की सर्वोत्तम परिणिति है।यह मानव मात्र की जीवन निधि है।अतः इसमें किसी प्रकार की सीमा रेखा नहीं खिँची जा सकती है। छत्तीसगढ़ी सँस्कृति अपने रुप की सँरचना मे भारतीय सँस्कृति का लघु रूप है।जैसे भारतीय सँस्कृति का स्वरूप”मोजक”है… वैसे ही छत्तीसगढ़ी सँस्कृति भी मोजक है.. भारतीय सँस्कृति मैं हर आँचलिक सँस्कृति अपना विशिष्ठ वयक्तित्व रखते हुए अपने सम्भार से भारतीयत सँस्कृति को सौंदर्यमय… एवं एश्वर्य मय बना रही है।ठीक उसी प्रकार छत्तीसगढ़ में कई सँस्कृतियाँ मिलती हैं। और वे अपनी विशेषता से परिपूर्ण होते हुए भी छत्तीसगढ़ के सर्वांगीण साँस्कृतिक वयक्तित्व मे एक सौंदर्य छटा औऱ काँति की रचना करती हैं।
अटकन-बटकन… दही चटकन.., खेलने वाले इस प्यारे से कौशल प्रदेश की सँस्कृति सम्पूर्ण भारत में अपना बहुत ही खास महत्व रखती है। भारत के ह्रदय स्थल पर स्थित छत्तीसगढ़, जो कि भगवान राम की कर्मभूमि भी रही है, प्राचीन काल, सभ्यता, संस्कृति, इतिहास और पुरातत्व की दृष्टि से अत्यंत संम्पन्न है। छत्तीसगढ़ की सँस्कृति मे अँचल के प्रसिद्ध उत्सव, नृत्य, संगीत, मेला-मड़ई तथा शिल्प शामिल हैं।…
जैसा कि हम जानते हैं… कि,मनुष्य की वास्तविक सँस्कृति उसकी प्रथाओं-लोक नृत्यों, परंपराओं, परंपरागत विश्वासों औऱ लोकगीतों में अन्तर निहित होती है।विश्व का कोई भी देश इसका अपवाद नहीं है।किसी भी राज्य..देश… जाती… सभ्यता… औऱ.. सँस्कृति ..का इतिहास का भान उसकी …प्रथाओं, लोक विधाओं… और लोक कलाओं से होता है। अपरिवर्तनीय रूप से… छत्तीसगढ़ की अरण्यक सँस्कृति के पास यह अमूर्त साँस्कृतिक संपदा है, जिसकी झलक उसके त्यौहारौं और उत्सवों पर पाई जा सकती हैं।
पपची…. अनरसा… खुरमी…. फरा…. जैसे स्वादिष्ट और सुगंधित… पकवान… खाने औऱ खिलाने वाला….आनंदी…. छत्तीसगढ़…. जब… आनंदित… होता है… तब…गाता है…. नदियों के गीत…, झरनों के गीत… ताल के गीत…. तलैयों के गीत…,वो अपने आनंद को.. वयक्त करने के लिए ..गाता है… पाँडवानी, भरथरी, ददरिया, जसगीत, बाँस गीत….. और जब किसी रूपसी ग्राम वधू का..प्रिय…. उसको… छोड़कर प्रदेश चला जाता है.. तो वह… अपनी वेदना को …छलकाती है… अपनी.. अँजन-अलँकृत आँसूओं की… धार औऱ “सुआ”गीतोँ के माध्यम से..।

सुआ-गीत….,जिसे वाचिक परंपरा के रूप में सदियों से पीढी दर पीढी… छत्तीसगढ़ की नारियाँ गाती रही हैं… यह गीत मूलतः गौंड आदिवासी नारियों का नृत्य गीत है…. जिसे सिर्फ स्त्रियाँ ही गाती हैं। यह गीत दीपावली के पर्व पर महिलाओं द्वारा गाया जाने वाला गीत है इसमें शिव पार्वती का विवाह मनाया जाता है.. मिट्टी के गौरा-गौरी बना कर उसके चारों ओर घुमकर सुवा गीत गाकर सुवा नृत्य करते हैं। कुछ जगहों पर मिट्टी के सुवा(तोते) बना कर यह गीत गाया जाता है.. यह दिपावली के दिन शिव-,पार्वती के विवाह के साथ समाप्त होता है….
सुआ गीत मे महिलाएं बाँस की टोकनी मे भरे धान के ऊपर सुआ अर्थात तोते कि प्रतिमा रख देती हैं… और वृताकार स्थिति में ..खडी़ होती हैं। महिलाएं सुआ की ओर ताकते हुए झुक-झुक कर चक्रराकार… चक्कर लगाते, ताली पीटते हुए नृत्य करते हुए गाती हैं।ताली एक बार… दायें एक बार बायें झुकते हुए बजाती हैं, उसी क्रम में पैरों को बढाते हुए शरीर मे लोच भरती है….
गीत का आरंभ”तरी नरी नहा ना री नहना, रे सुवा ना…..’से एक दो नारियां करती हैं…..जिसे गीत उठाना कहते हैं।उन के द्वारा पदों को गाने के तुरंत बाद, पूरी टोली उस पद को दुहराती है…तालियों की थप-थप एवं गीतोँ का संयोजन इतनाकर्णप्रिय औऱ मधूर होता है कि किसी भी वाद्ययंत्र की आवश्यकता महसूस ही नहीं होती।सँयुक्त स्वर लहरियां दूर तक कानों मैं रुन-झून कर करते मीठे रस घोलती हैं। इन गीतों मे विरह के मूल भाव के साथ ही दाम्पत्य बोध, कथोपकथन, मान्यताओं को स्वीकारने का सहज भाव पिरोया जाता है।सभी वय को स्त्रियाँ सुवा गीतों को गाने और नाचने को लालायित रहती हैं। इसमें सम्लित होने किशोरवय छत्तीसगढ़ी अलकाऐं…. अपनी संगी सहेलियों को सुवा गान औऱ नृत्य मे शामिल होने… जाते देखकर अपनी माताओं से.. गुहार करती हैं कि… उनको भी सुवा नृत्य ..और गान मे….जाना है.., इसलिए…कहती हैं– “देतो दाई देतो तोर गोड के पैरी, सुवा नांचे बर जाहूं”..। यह गीत प्रद्रशित करता है कि सुवा गीत-नृत्य मे.. नारियाँ संपूर्ण.. सज-धज के साथ प्रस्तुत होती हैं।
समग्र भारत मे अलग-अलग रूपों में.. प्रस्तुत विभिन्न प्राँतों के लोकगीतों मे एक… जनगीत जिसमें …नव परिणिता… विवाह के बाद… अपने बाबूल के घर से अपने सभी रिशतेदारों के लिवाने आने पर भी जाने को तैयार नहीं होती…. किन्तु पति के लिवाने आने पर सहर्ष तैयार हो जाती है।इसी गीत का का निराला रूप यहाँ के सुवा गीतों में देखने को मिलता है।यहाँ की परंपरा एवं नारी प्रधान गीत होने के कारण… छत्तीसगढ़ी सुवा गीतों में सास के लेने आने पर वह… नव–परिणीता ससुराल जाने को तैयार होती है…, सास सुसूराल के रास्ते में अक्ल बतातीं है, परिवार और समाज में रहने की रीत समझातीं है.. इस खूबसूरत गीत के माध्यम से—
“अरसी फूले सुनुक झुनुक गोंदा फूले छतनार,
रे सुआना कि गोंदा फुले छतनार
वोहू गोंदा ला खोंचे नयी पायेंव,
आगे ससुर लेन हार…..’

पुरूष प्रधान समाज मे बेटी होने का दुख साथ ही कम वय मे विवाह कर पति के घर भेज देने का दुख किसी भी बालिका को असह्य् होता है।ससुराल में उसे घर के सारे कार्य करने पड़ते हैं, ताने सुनने पड़ते हैं…. बेटी को पराई समझने की परंपरा पर प्रहार करती यहाँ की बेटियाँ अपना दुख इन्हीं सुआ गीतों मे पिरोती हैं…., कहती हैं….’मुझे नारी होने की सजा मिली है, जो बाबूल ने मुझे विदेश.. ब्याह दिया…और भाई को दुमंजिला रंगमहल…. रोते हुए… ..करूण स्वर में गाती है—
“पंया परत हौँ मैं चँदा सूरज के,
रे सुवना तिरिया जनम झनि देय
तिरिया जनम मोर अति रे कलपना,
रे सुवना जहंवा पठयी तहं जाए
अंगठी मोरी मोरी, घर लिपवावे, रे सुवना
फेर नन्द के मन नहीं आए
बाँह पकरि के सैंया घर लाये,
रे..सुवना ससुर ह सटका बताय
भाई ल देहे रंगमहलवा दुमंजला,
रे सुवना हमला तो.. देहें… बिदेस..”

खूबसूरत… रंगीन… चिंगी वस्त्र और आभूषणों से…. सज्जित छत्तीसगढी… मधूलिकाएँ.. जब सुवा गीतों में अपने दुखों को.. बिसरा कर… गाते हैं और नृत्य करती हैं… समग्र वातावरण… इँद्रावती… के… उपवन के समान खिल उठता.. और पुरूष वर्ग… कल्पना लोक में इन रूपसी… बनिताओं के.. प्रिय”सुवा”बनने को लालायित हो जाता है…और कटुता और स्वार्थ से… अभिमंत्रित.. जिंदगी.. जड़वत होकर… कल-,कल… छल-छल.. कर बहती लोकरंजन गीतों की सरिता का जल अपने रगों में आत्मसात कर ने… कोआतुर हो जाती है…. क्योंकि,… काल के साथ… सरकती.. सभ्यता और सँस्कृति मे ..आदिम जीवन की… झलक.. इन्हीं लोकगीतों मे… दिखाई देती है।

-मँजू दिल से

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