manju kala

रौलां गैरा और मैं

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आ..!!आ!!मेरे बचपन.. आ…!लौट.. के फिर से ..आ!!
इक्कीसवीं सदी का मध्यकाल.. हैरान… परेशान…. दौड़ती दुनिया… ..,थककर बैठी हूँ…. नदी के धारे पर…और …मुस्कुरा रही….हूँ नन्ही ओडिसी नृत्यांगनाओ की..मासूम अठखेलियाँ देखकर… जितनी चपलता से ये नृत्य करती हैं… उतनी ही तत्परता से ये सब वनिताएं डाक्टर और इंजीनियर बनने की होड़ में भी शामिल है..इनकी जिंदगी कोचिंग क्लासेस और नृत्य क्लासेज के बीच में छुप्म-छुपाई खेलती रहती है… बेचारी… त्रिशुंकाए…!
चकित हूँ मे भी… सोचती हूं कि कितनी बदल गई है दुनिया… दुनिया के लोग… मैं स्वयं…जिस हिंदुस्तान मे मै बडी हुई वो हिंदुस्तान मुझे कहीं नजर नहीं आता…बडी़-बडी़ ..अट्टालिकाओं मे निवास करते… छितरे-छितरे रोबोट होते लोग।तकनीक ने इनसान के रहन सहन को ही नहीं बदला, बल्कि उसे भी काफी हद तक बदल दिया है।शायद इसलिए आज इनसान मशीन होता जा रहा है और मशीन इनसान के रूप में सामने आ रही है।वक्त कैसे बदला… कब बदला.. पता ही नहीं चला.. आज का समय देखती हूं, तो पाती हूँ कि आज के बच्चे छुटियों से पहले ही अपने माता पिता से तोहफे और गेम्स की डील कर लेते हैं, ताकि वह अपने कमरे में आराम से एसी चलाकर अपनी छुटियाँ बिता सकें, हालांकि सोचती हूं कि परिवर्तन लाजिमी है.. वह हर पल अपना रूप बदलतीं रहती है, जबकि परिवर्तन हमारे जीवन में दो तरिके से आता है, एक बाहरी एक भितरी।बाहरी बदलाव हमारे बस में नहीं होता, पर अपने भीतर के बदलाव को तो हम नियंत्रित कर सकते हैं।मुझे लगता है कि जिस हिंदुस्तान में मैं बडी़ हुई… उस हिंदुस्तान और आज के हिंदुस्तान में जमीन-आसमान का फर्क आ गया है।पिछले वर्षों में…. मैं और हिंदुस्तान बहुत बदल गया है…. तब.. हमारी जिंदगी गैजेट्स हावी नहीं थे… मोबाइल, कार… और बाइक का दौर नहीं था…स्मरणिकाओं मे… दस्तक देती है… ब्लु कलर की साइकिल पर… दो पौनीटेल वाली. एस०,एम०जैन डिग्री कालेज की.. , इंक…से कपडों पर रवी शास्त्री का नाम लिखने वाली छात्रा!

manju kala dehradun
मेरा यह मानना है कि जिंदगी में बदलाव जरूरी है… यह एक सतत प्रक्रिया है… हम प्रवास करते हैं… फिर प्रवाह करते हैं… एक जिंदगी तभी परवान चढती है… जब उसके माता-पिता अपने अरमानों को परवान चढाते हैं।
एक अल्हड़ नदी की तरह.. उछल कूद कर कालेज जाने वाली छात्रा… जब एक पत्नी की भूमिका को स्वीकार करती है.. तब वह सृष्टी का सृजन करती है… सृजन की परंपरा को अपनाती है…अपने जीवन के इस बडे बदलाव को स्वीकार करती है। उसे शारिरिक, मानसिक, सामाजिक, पारिवारिक… हर स्तर पर बदलाव को स्वीकार करना पड़ता है, इसलिए मैं मानती हूँ कि …परिवर्तन प्रकृति का… चिरंतन नियम है।

manju kala
स्मृतियों की….साईकिल …. घूमाऊं…तो हौले से… गुजरता ,है …एक.. छोटा सा ऐतिहासिक कस्बा… ,टीन के छतों वाली कालोनी.. कल-,कल छल-छल ….का सुरीला गीत सुनाती…. बेला के गजरे सी …मोहक… अलमंडा नदी…और… अमलताश के पेडों के इर्दगिर्द…. जंगली हिरणी सी…कुलांचें भरती मेरी… सखियाँ और ..मै..भी।! हम गेंद खेलती थीं… ,रस्सी कूदती थी….’ स्टापू खेलती थी…. या खुले मैदान में… दौड लगाती थीं..,तब कितना बड़ा लगता था वह मैदान ।आम अमरूद के बागीचे थे वहां… और हाँ …! जब गर्मियों की छुट्टियां पडती तो हम सब आम के पेडों के नीचे घर-घर खेलते और गुड्डे -गुडिय़ों का ब्याह रचाते…., उफ:कितनी तैयारियां करनी पडती…. अपनी -अपनी पिटारियाँ खोलना, उसमें से बर्तनों को ढूंढना किसी की पिटारी मे पतीली मिलती किसी मे बाल्टी…। फूलों को… चुरा के लाना पडता….,डाक बंगले से.., और..गुडिया की चुनरी मे गोटा लगाने के लिए मां से मनुहार…. सो अलग।! बहुत दिन तक मां का कहा मानना पडता था…औरकिरन दीदी ..व पप्पी भैया को मनाने मे कितने पापड.बेलने पड़ते की वो हमारी गुडियाऔर गुड्डे के ब्याह मे . …गुडिय़ा की माँ और गुड्डे के बाबा।बनें…,गुडिया की सजावट.. ,दुल्हे की पगड़ी का इंतजाम…कितने काम… न..ही पूछिएगा तोही अच्छा…। और फूल तोडने के जुर्म में पिताजी से पडने.. वाली डाँट.. तौबा..!, कमबख्त माली न जाने कब जाकर शिकायत कर देता था..!
सच मे… कितने खुशनुमा थे वे दिन… पिताजीसफेद रंग की हाफपैंट पहन कर सुबह की सैर पर जाते और मैं उछलती-कूदती… जंगली फूल पत्तियों का संग्रहण करती पीछे से। वे मुझसे देश और दुनिया की बातें करते . ..और मेरा मन अटकता , “एम्मा” मे।। पिताजी दफ्तर जाते.. मै स्कूल ..और माँ… दिन में स्वेटर बुनती…और धूप में नीली साडी़ पहनकर., गोल सा जूड़ा बनाकर… गाने सुनती,–“तेरे चेहरे से नजर नहीं हटती.. नजारे… हम क्या देखें…. “,तभी लाल चैक की शर्ट पहनने हौले से मुस्कुराते हुए पिताजी आ जाते…. दोपहर का भोजन करने..!
जब सावन का महीना आता और कुसुम के वृक्षों पर बैठा चातक पक्षी.. पिहू -पिहू की रट लगाता और नजदीकी साल के जंगल में मोर भी”केहूँ…. की टेर लगाता..,,, और….,रंगबिरंगे छाते…शहर की ताम्र वर्णी सडकों पर…विचरण करने लगते…. तब..डेरी फार्म में…

झूले पड़ते..,, और कल्लु ग्वाला लंबी-लंबी पेंग बढाता था। और माथुरिया आंटी, वर्मा आंटी, पैरों में महावर रचा कर “कजरी ” गातीं …और मेरी माँ.. पैरों में मेंहदी रचाती और.., पहाड़ी धून मे -,”घूघूती न बासा.. ” .नामक पहाड़ी खुदेड़…. गीत गाती…., और हम सब बच्चे कालोनी के घरों की मरम्मत के लिए आइ हुईं रेत के टीलों पर सांझ के समय…. घरौंदे बनाते…, मोटर मार्ग बनाते ,…और दूर….. नीले.. आसमान पर उग आए इंंद्रधनुष को देखकर तालियां बजाते।…जब मैं आसमान को देखती… , तो देखती रह जाती थी….सोचती थी की…कितना.. बडा़ है आसमान… इसका तो कोई छोर ही नहीं…! जैसे-जैसे बड़ी हुई, तब कालोनी भी छोटी लगने लगी..और इतवार के दिन… जिस मैदान में पिताजी क्रिकेट खेलते थे, और मैं भी ज्योल गार्नर की तरह लाल पी कैप लगाकर …लंच टाइम में बंटने वाले पुलाव का ..सब खिलाड़ियों मे वितरण करने वाले… दयालसिंह और नत्थी की मदद किया करती थी, तो वह..वह मैदान भी तब छोटा लगने लगा… अब तो मैं दस मिनट में ही इसका चक्कर लगा सकती थी, पर…. आसमान तो अब भी अनंत सा लगता …था। हाँ… उसमें रोज बदलाव महसूस करती थी; खासकर बारिश के दिनों में।। काले-काले मेघों का घिर आना,बारिश की बूंदों का झरना.. और फिर… बारिश के बंद होने पर बादलों से झांकते.. चंदामामा का प्रकट होना।
तब मुझे महसूस होता है कि जिंदगी के ये बदलाव खुले आसमान की तरह ही हैं..। और बदलाव उस गीत की तरह हैं… जिसे सूर और ताल के साध गाया जाए तो उससे खूबसूरत और कुछ नहीं, और सुर यदि बिगड़ जाए तो उससे होने वाली तकलीफ का अंदाजा लगाना भी मुश्किल!… बदलाव का खुला आसमान सामने है… बस जरूरत है उसे.. जतन से संंवारने की। आज भी जब रात को आसमान में टिमटिमाते… तारों को निहारती हूं तो मुझे याद आते हैं ….रात को आस्ट्रेलिया में होने वाले मैच को देखने के लिए घड़ी में अलार्म भरते हुए मेहताअंकल से गुफ्तगू करते मेरे पिता..(,वे दोनों रात को साथ में मैच देखते थे… और साक्षी होती थी मैं..।) बरसात के दिन… ,काली के मंदिर में बजने वाली घंटियां… उफनती तमसा नदी और”रौलां-गैरा”की लाल मिट्टी पर.. अपनी खुबसूरत स्कर्ट् पर इतराने वाली स्टेफी ग्राफा….और हिमालयन कार रैली में फर्राटा भरती… एक लडकी की जोंगा… कार को विस्मय से निहारती..कालोनी के गेट पर चढी हुई….दो चोटी वाली.. बित्ती सी.. मधूलिका..!

मंंजू दिल से

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